Citizen News Jaipur

By: Jaipur City Reporter | November 23, 2017

Rani Padmavati issue

Much has been said and done about the upcoming Sanjay Leela Bhansali's film "Padmavati'.

On one end there is Freedom of Expression warriors and on the other end there are Karni Sena (self claimed Rajput representatives) warriors. The movie has kicked up storm in Rajput heavy states as they think the Portrayal of Rani Padmavati is below their dignified standards. My take on this

Padmavati issue is Commercialism/Capitalism meets Politics. Both vested interests are at locked horns with each other. At one end its Bollywood who will fall to any depth to make some money and on the other hand its a fringe group fighting to get a stake in political power.


Recently a renowned journalist Ved Pratap Vaidik got to see the advance screening of the movie and he wrote an editorial in Dainik Bhaskar. He has cleared all the misconceptions about the movie, the movie is clean as it can get. Its all about getting cheap popularity from one side, and power politics from other side. Below is the article written by VedPratap Vaidik: Courtesy: Bhaskar

भास्कर अभिव्यक्ति: जिन्होंने पद्मावती फिल्म देखी, उनसे जानिए सच क्या है?


नई दिल्ली. फिल्म पद्मावती पर विवाद थम नहीं रहा। सेंसर बोर्ड ने भी तकनीकी वजहों से अभी फिल्म मूवी मेकर्स को लौटा दी है। मेकर्स का कहना है कि वे सेट नॉर्म्स पर फिल्म का रिव्यू करने के बाद ही इसे बोर्ड को वापस भेजेंगे। भास्कर के संपादकीय पेज ‘अभिव्यक्ति’ पर सीनियर जर्नलिस्ट वेदप्रताप वैदिक ने फिल्म देखकर अपना अनुभव हमारे रीडर्स के लिए साझा किया...

''फिल्म पद्मावती को लेकर आजकल जैसा बवाल मच रहा है, अफवाहों का बाजार जैसे गर्म हुआ है, वैसा पहले किसी फिल्म के बारे में सुनने में नहीं आया। बवाल मचने का कारण भी है। पद्मावती या पद्मिनी सिर्फ राजस्थान ही नहीं, सारे भारत में महान वीरांगना के तौर पर जानी जाती हैं। मध्ययुग के प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी महान कृति ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ की इस महारानी का ऐसा सुंदर चरित्र-चित्रण किया है कि वे भारतीय नारी का आदर्श बन गई हैं। यदि ऐसी पूजनीय देवी का कोई फिल्म, कविता या कहानी में अपमान करे तो उसका विरोध क्यों नहीं होना चाहिए और डटकर होना चाहिए। लेकिन यह जरूरी है कि विरोध करने के पहले उस कला-कृति को देखा जाए, पढ़ा जाए और उसका विश्लेषण किया जाए। मुझे पता नहीं कि जो संगठन इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उनके नेताओं ने यह फिल्म देखी है कि नहीं। मैंने यह सवाल पिछले हफ्ते एक लेख में उठाया था। मुझे राज-परिवारों से संबंधित मेरे कुछ मित्रों ने प्रेरित किया कि मैं फिल्म देखूं और अपनी राय दूं।''


''मैंने यह फिल्म देखी। फिल्म ज्यों ही शुरू हुई, मैं सावधान होकर बैठ गया, क्योंकि यह फिल्म मैं अपने मनोरंजन के लिए नहीं देख रहा था। देखना था कि इसमें कोई संवाद, कोई दृश्य, कोई गाना ऐसा तो नहीं है, जो भारत के इतिहास पर धब्बा लगाता हो, अलाउद्दीन जैसे दुष्ट शासक को ऊंचा उठाता हो और पद्मावती जैसी विलक्षण महारानी को नीचा दिखाता हो। मुझे यह भी देखना था कि महाराजा रतन सिंह जैसे बहादुर, लेकिन भोले और उदार व्यक्तित्व का चित्रण इस फिल्म में कैसा हुआ है। मेरी चिंता यह भी थी कि फिल्म को रसीला बनाने के लिए कहीं इसमें ऐसे दृश्य तो नहीं जोड़ दिए गए हैं, जो भारतीय मर्यादाओं का उल्लंघन करते हों।''


''बिना देखे ही फिल्म पर जितनी टीका-टिप्पणी हुई है, उसका फायदा फिल्म-निर्माता ने जरूर उठाया होगा। उसने विवादास्पद संवाद-दृश्य उड़ा दिए होंगे। फिल्म के कथा लेखक, इतिहासकार और निर्माता सर्वज्ञ नहीं होते हैं। वे गलतियां करते हैं और कई बार उनके कारनामे आम दर्शकों को गहरी चोट भी पहुंचाते हैं। इस फिल्म को सबसे बड़ा फायदा यह मिला है कि इसका जबर्दस्त प्रचार हो गया है। इस फिल्म को अब भारत के अहिंदीभाषी प्रांतों में भी जमकर देखा जाएगा। इस फिल्म का खलनायक सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी है। यह जो खिलजी शब्द है, इसका सही पश्तो और फारसी उच्चारण गिलजई है। अफगानिस्तान में एक ‘जहांसोज अलाउद्दीन’ भी हुआ था। यानी सारे संसार को भस्मीभूत करने वाला। अलाउद्दीन के इस भस्मासुर रूप को इस फिल्म में नई युद्ध-तकनीक दिखाकर बताया गया है। अलाउद्दीन ने तोप जैसे यंत्र से चित्तौड़ के किले पर ऐसा हमला किया कि उसके अग्निबाणों से वहां की सेना का बचना मुश्किल हो गया।''

''इस फिल्म में अलाउद्दीन एक धूर्त्त, अहंकारी, कपटी, दुश्चरित्र और रक्तपिपासु इंसान की तरह चित्रित है। वह अपने चाचा सम्राट जलालुद्दीन की हत्या करता है, अपनी चचेरी बहन से जबर्दस्ती शादी करता है, वह समलैंगिक है, वह उस राघव चेतन की भी हत्या कर देता है, जो उसे पद्मावती के अलौकिक सौंदर्य की कथा कहकर चित्तौड़ पर हमले के लिए प्रेरित करता है। अलाउद्दीन ने धोखे से महाराज रतन सिंह को दिल्ली बुलाकर गिरफ्तार कर लिया, लेकिन बहादुर पद्मावती खुद दिल्ली जाकर अलाउद्दीन को चकमा देकर रतन सिंह को छुड़ा लाती हैं। अलाउद्दीन और रतनसिंह की मुठभेड़ों में मजहब कहीं नहीं आता। वह मामला शुद्ध देशी और विदेशी का दिखाई पड़ता है।''


''जहां तक पद्मावती का प्रश्न है, श्रीलंका की राजकुमारी और परम सुंदरी युवती को रतन सिंह एक शिकार के दौरान देखते हैं और उसके प्रेम-पाश में बंध जाते हैं। फिल्म के शुरू से अंत तक पद्मावती की वेशभूषा और अलंकरण अद्वितीय हैं। वे चित्तौड़ की इस महारानी के सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। रतनसिंह और पद्मावती के प्रेम-प्रसंग को चोरी-चोरी देखने वाले राघव चेतन को देश-निकाला दिया जाता है। पद्मावती उसे सजा-ए-मौत देने की बजाय देश-निकाला सुझाती हैं। ऐसी उदार पद्मावती का वह दुर्गा रूप भी देखने को मिलता है, जब उन्हें अलाउद्दीन खिलजी की इच्छा बताई जाती है।''

''पूरी फिल्म में कहीं भी ऐसी बात नहीं है, जिससे दूर-दूर तक यह अंदेशा हो कि पद्मावती का अलाउद्दीन के प्रति जरा-सा भी आकर्षण रहा हो, बल्कि पद्मावती और रतनसिंह के संवाद सुनकर सीना फूल उठता है कि वाह! क्या बात है! एक विदेशी हमलावर से भिड़कर जान न्योछावर करने वाले ये राजपूत भारत की शान हैं। इस फिल्म में पद्मावती साहस और चातुर्य की मिसाल भी हैं। वे कैसे अपने 800 सैनिकों को अपनी दासी का रूप देकर दिल्ली ले गईं और किस तरकीब से पति को जेल से छुड़ाया, यह दृश्य भी बहुत मार्मिक और प्रभावशाली है। दूसरे युद्ध में वीर रतन सिंह कैसे धोखे से मारे गए, कैसे उन्होंने अलाउद्दीन के छक्के छुड़ाए और कैसे पद्मावती ने हजारों राजपूत महिलाओं के साथ जौहर किया, यह भी बहुत रोमांचक समापन है। जहां तक घूमर नृत्य का सवाल है, उसके बारे में भी तरह-तरह की आपत्तियां की गई थीं। लेकिन वह नृत्य किसी महल का बिल्कुल अंदरूनी मामला है। वह किसी शहंशाह की खुशामद में नहीं किया गया है। उस नृत्य के समय महाराज रतन सिंह के अलावा कोई भी पुरुष वहां हाजिर नहीं था। वह नृत्य बहुत संयत और मर्यादित है। उसमें कहीं भी उद्दंडता या अश्लीलता का लेश-मात्र भी नहीं है।''


''यह फिल्म मैंने इसलिए भी देखी कि हमारे एक पत्रकार मित्र की पत्नी ने, जो मेरी पत्नी की सहपाठिनी रही हैं, मुझे मुंबई से संदेश भेजा और कहा कि आपको शायद पता नहीं कि मैं प्रतिष्ठित राजपूत परिवार की बेटी हूं और इस फिल्म में मैंने छोटा-सा रोल भी किया है। यह फिल्म राजपूतों के गौरव और शौर्य की प्रतीक है। इस फिल्म को बाजार में उतारने के पहले राजपूत संगठनों के नेताओं को भी जरूर दिखाई जानी चाहिए। मुझे समझ में नहीं आता कि हमारे सभी नेता इतने विचित्र और डरपोक क्यों है। वे इतने डर गए हैं कि सेंसर बोर्ड को भी परहेज का उपदेश दे रहे हैं। अदालत ने फिल्म पर रोक लगाने से मना कर दिया। यदि इसमें कोई गंभीर आपत्तिजनक बात हो तो सेंसर बोर्ड और अदालत, दोनों को उचित कार्रवाई क्यों नहीं करनी चाहिए, लेकिन अफवाहों के दम पर देश और सरकार चलाना तो लोकतंत्र का मजाक है।''

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


Source: https://www.bhaskar.com/news/ABH-vedpratap-vaidik-column-on-padmavati-film-controvercy-5748804-NOR.html?seq=2

Comments:

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